होलिका दहन: बुराई के दहन से नए आरंभ तक
फाल्गुन पूर्णिमा की रात को जलने वाली होलिका केवल लकड़ियों और उपलों का ढेर नहीं है, यह हमारे भीतर जमी नकारात्मकता, अहंकार और भय के दहन का गहरा प्रतीक है। होली से एक दिन पहले मनाया जाने वाला यह अनुष्ठान हिंदू परंपरा में “बुराई पर भलाई की विजय” का सजीव उत्सव माना जाता है।
होलिका दहन: होलिका दहन की पौराणिक कथा
होलिका दहन का सीधा संबंध भक्त प्रह्लाद और राक्षस राजा हिरण्यकशिपु की कथा से है। हिरण्यकशिपु ने कठोर तप से ऐसा वरदान पाया था कि उसे न मनुष्य मार सके न पशु, न दिन में न रात में, न घर के अंदर न बाहर, और इसी घमंड में उसने स्वयं को भगवान घोषित कर दिया। उसके पुत्र प्रह्लाद ने विष्णु‑भक्ति छोड़ने से इनकार कर दिया, तो उसने उन्हें कई बार मारने का प्रयास किया, पर हर बार वे बच निकले।
अंततः हिरण्यकशिपु ने अपनी बहन होलिका को, जिसे अग्नि से न जलने का वरदान था, आदेश दिया कि वह प्रह्लाद को गोद में लेकर अग्नि में बैठे। किंतु परिणाम इसके विपरीत हुआ—होलिका अग्नि में जलकर भस्म हो गई और प्रह्लाद सुरक्षित बाहर आ गए। इसी घटना की स्मृति और संदेश को जीवित रखने के लिए हर वर्ष फाल्गुन पूर्णिमा की रात्रि को होलिका दहन किया जाता है।

प्रतीकात्मक और आध्यात्मिक महत्व
होलिका दहन केवल एक कथा का स्मरण नहीं, बल्कि एक जीवन‑दर्शन है। होलिका अहंकार, अत्याचार और गलत उपयोग की गई शक्ति का प्रतीक है, जबकि प्रह्लाद अडिग श्रद्धा, सच्चाई और निष्कपट भक्ति के प्रतीक हैं। जब होलिका जलती है, तो यह संदेश मिलता है कि चाहे दंभ कितना ही बड़ा क्यों न हो, अंततः पराजित होगा; और सच्चा विश्वास अंत में सुरक्षित रहेगा।
आध्यात्मिक दृष्टि से, होलिका दहन को अपने भीतर बसे दोषों—क्रोध, द्वेष, ईर्ष्या, लोभ और नकारात्मक विचारों—को आग के हवाले करने का अवसर माना जा सकता है। इसीलिए कई लोग संकल्प लेकर अग्नि के सामने प्रार्थना करते हैं कि उनके जीवन की पुरानी “बुराइयां” भी इसी अग्नि के साथ भस्म हो जाएं।
ज्योतिष और पंचांग के अनुसार होलिका दहन
धार्मिक दृष्टि से होलिका दहन हमेशा फाल्गुन पूर्णिमा की रात में, विशेषकर प्रदोष काल (सूर्यास्त के बाद से लेकर लगभग दो–ढाई घंटे तक) में किया जाना श्रेष्ठ माना गया है। पंचांगों के अनुसार जिस दिन प्रदोष काल में पूर्णिमा तिथि हो, वही दिन होलिका दहन के लिए ग्रहणीय होता है।
ज्योतिषीय नियमों में यह भी स्पष्ट किया गया है कि भद्रा‑काल विशेष रूप से भद्रा‑मुख के समय होलिका दहन वर्जित है, क्योंकि यह राक्षसी मुहूर्त माना जाता है। यदि फाल्गुन पूर्णिमा के साथ भद्रा या चंद्रग्रहण जैसे योग बनें, तो अलग‑अलग पंचांग अलग नियमों को प्राथमिकता देकर थोड़ा भेद भी बताने लगते हैं, जैसा कि 2026 जैसे वर्षों में देखा जा रहा है।
होलिका दहन 2026 का शुभ मुहूर्त
तारीख: 3 मार्च 2026 (मंगलवार)
शुभ मुहूर्त:
- शाम 6:22 बजे से रात 8:50 बजे तक
- (कुल अवधि: लगभग 2 घंटे 28 मिनट)
होलिका दहन की संक्षिप्त पूजा‑विधि: परंपरा और भाव
विभिन्न क्षेत्रों में कुछ भेद होने पर भी होलिका दहन की मूल पूजा‑विधि लगभग समान है।
स्थान की तैयारी
किसी चौराहे या खुले स्थान पर लकड़ियां, उपले और सूखी घास से होलिका का ढेर तैयार किया जाता है।
पूजन सामग्री
रोली, चावल, हल्दी, मौली, फूल, गुड़, बताशे, नारियल, गेहूं/चना की बालियां, दीपक और अगरबत्ती आदि थाली में सजाए जाते हैं।
संकल्प और पूजा
परिवार सहित पहुंचकर सबसे पहले संकल्प लिया जाता है—अपने और परिवार के लिए मंगल, रोगों से रक्षा, पापों के नाश और समृद्धि की कामना की जाती है। फिर होलिका के चारों ओर मौली लपेटकर रोली‑अक्षत, फूल, गुड़ और अनाज अर्पित किए जाते हैं।
अग्नि प्रज्वलन और परिक्रमा
शुभ मुहूर्त में अग्नि प्रज्वलित की जाती है। इसके बाद लोग तीन, पांच या सात परिक्रमाएं करते हुए गेहूं/चने की बालियां, गुड़ और तिल आदि अग्नि में डालते हैं। ऐसा मानते हैं कि इनके साथ जीवन की अशुभता भी जलकर नष्ट हो रही है।
राख और जली बालियों का महत्व
अगले दिन होलिका की ठंडी हुई राख को शुभ माना जाता है; कई लोग इसे घर के मुख्य द्वार या आंगन में छिड़कते हैं, मान्यता है कि इससे नकारात्मक शक्तियां दूर रहती हैं। जली या आधी‑जली बालियों को प्रसाद की तरह बांटा और खाया जाता है, जो आने वाले वर्ष की समृद्धि का प्रतीक है।
सामाजिक और मनोवैज्ञानिक आयाम
होलिका दहन का एक महत्वपूर्ण पक्ष समाज को जोड़ने वाली उसकी सामूहिकता है। पूरे मोहल्ले या गांव के लोग एक ही स्थान पर एकत्र होते हैं, साथ‑साथ पूजा करते हैं और दहन देखते हैं। यह सामूहिक अनुष्ठान रिश्तों में निकटता बढ़ाता है और लोगों को यह एहसास कराता है कि वे एक बड़े समुदाय का हिस्सा हैं।
मनोवैज्ञानिक रूप से भी, “बुराई को आग में समर्पित करना” एक प्रकार की प्रतीकात्मक थैरेपी जैसा अनुभव देता है—मानो व्यक्ति अपने अंदर की भारी चीजों को बाहर रखकर हल्का हो रहा हो। यही कारण है कि कई परिवार इस दिन पुराने मनमुटाव भूलने और रिश्तों को नए सिरे से शुरू करने का निर्णय लेते हैं।
जलती होलिका, जागती चेतना
होलिका दहन केवल त्योहार का प्रारंभिक चरण नहीं, बल्कि अपने भीतर झांकने का निमंत्रण है। हर वर्ष जली होलिका यह पूछती है कि इस बार तुमने अपने भीतर से क्या जलाया—अहंकार, क्रोध, ईर्ष्या या किसी के प्रति पुरानी शिकायत?
यदि अग्नि के सामने खड़े होकर मन में यह निश्चय ले लिया जाए कि आने वाला वर्ष अधिक सजग, अधिक शांत और अधिक करुणापूर्ण जिया जाएगा, तभी होलिका दहन का वास्तविक संदेश सार्थक होता है।
होलिका दहन केवल एक रात की घटना नहीं है। यह एक चेतना है, जो हमें हर वर्ष याद दिलाती है कि परिवर्तन संभव है।
अग्नि में जलती लकड़ियाँ हमें यह संकेत देती हैं कि अंत हमेशा एक नई शुरुआत का द्वार खोलता है।
जब अगली सुबह रंगों की होली शुरू होती है, तो वह केवल उत्सव नहीं, बल्कि एक नई ऊर्जा का प्रतीक होती है — जैसे जीवन ने स्वयं को फिर से रंगों से भर लिया हो।
इस बार जब आप होलिका दहन देखें, तो बस एक पल के लिए आँखें बंद करें और सोचें —
आप अपने भीतर की कौन सी नकारात्मकता को इस अग्नि में समर्पित करना चाहते हैं?
क्योंकि असली होलिका दहन बाहर नहीं, हमारे भीतर होता है।
(डिस्क्लेमर: यह पाठ्य सामग्री आम धारणाओं और इंटरनेट पर मौजूद सामग्री के आधार पर लिखी गई है। Publicreact.in इसकी पुष्टि नहीं करता है।)
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