बरसाना लठमार होली का ऐतिहासिक महत्व
लठमार होली बरसाना (श्री राधा रानी का गाँव) और नंदगांव (कृष्ण का गाँव) में मनाई जाती है, जहाँ नंदगांव के पुरुष (हुरियारे) बरसाना आते हैं और स्थानीय महिलाएँ (हुरियारिन या गोपियाँ) उन्हें प्रेमपूर्वक लाठियों से मारती हैं। यह लीला तब की है जब श्री कृष्ण के सखा बरसाना होली खेलने आए और श्री राधा रानी की सखियों ने उन्हें छेड़ा। परंपरा के अनुसार, पकड़े गए पुरुष महिलाओं के वेश में नाचने को मजबूर होते हैं, जो हँसी-मजाक और समानता का प्रतीक है।
बरसाना की लठमार ब्रज होली केवल एक उत्सव नहीं, बल्कि सदियों पुरानी परंपरा, प्रेम और सांस्कृतिक मर्यादा का जीवंत रूप है। फाल्गुन मास में जब पूरा ब्रज रंगों में डूबता है, तब राधा रानी की जन्मभूमि बरसाना में खेली जाने वाली लठमार होली दुनिया भर का ध्यान अपनी ओर खींचती है।
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लेकिन क्या आप जानते हैं कि इस रंगोत्सव के पीछे सख्त नियम, पारंपरिक अनुशासन और धार्मिक मर्यादाएँ भी हैं? आइए जानते हैं बरसाना लठमार होली के नियम और परंपराएँ विस्तार से।

लठमार होली की ऐतिहासिक परंपरा
मान्यता है कि भगवान श्रीकृष्ण अपने सखाओं के साथ नंदगांव से बरसाना राधा रानी और सखियों को रंग लगाने आते थे। तब राधा की सखियाँ उन्हें लाठियों से चिढ़ाते हुए भगाती थीं। उसी लीला की स्मृति में आज भी यह परंपरा निभाई जाती है।
यह केवल खेल नहीं, बल्कि राधा-कृष्ण की प्रेम लीला का प्रतीक है।
लठमार होली की श्री जी मंदिर से शुरुआत
लठमार होली का मुख्य आयोजन राधा रानी मंदिर (श्रीजी मंदिर) परिसर में शुरू होता है।
पहले पूजा-अर्चना होती है, फिर रंगोत्सव आरंभ होता है।
बरसाना लठमार होली 2026 की तिथियाँ और समय
2026 में बरसाना लठमार होली मुख्य रूप से 25 फरवरी (बुधवार) को खेली जाएगी, जो सुबह 10 बजे से 26 फरवरी शाम 6 बजे तक चलेगी। 24 फरवरी को लड्डू मार होली से शुरुआत होगी, और 26 फरवरी को नंदगांव में इसका जवाबी आयोजन होगा। रंगीली गली और राधा रानी मंदिर प्रांगण मुख्य स्थल हैं।
मुख्य परंपराएँ
नंदगांव के पुरुष ढाल लेकर बरसाना पहुँचते हैं, जहाँ महिलाएँ लाठियों (नरम लाठियाँ) से उन्हें छेड़ती हैं।
पूरे समय ब्रज लोकगीत जैसे “चलो बरसाने आयो री” और “रंग बरसे” गाए जाते हैं, ढोल-नगाड़े बजते हैं।
गुलाल, फूल, रंग बरसाए जाते हैं; गुजिया, ठंडाई वितरित होती है।
शोभायात्रा निकलती है, जिसमें झंडियाँ, रंग और हँसी का राज होता है।
अंत में राधा रानी मंदिर में सामूहिक आरती और प्रसाद वितरण।
पारंपरिक वस्त्र अनिवार्य
महिलाएँ पारंपरिक साड़ी या घाघरा-चोली पहनती हैं
पुरुष धोती-कुर्ता या पारंपरिक ब्रज पोशाक में होते हैं
आधुनिक या अनुचित वस्त्रों को प्रोत्साहित नहीं किया जाता।
पूजा विधि और अनुष्ठान
दिन की शुरुआत स्नान और राधा-कृष्ण पूजन से होती है। गुलाल लगाकर विग्रहों का अभिषेक करें, लोकगीत गाएँ, लठमार शोभायात्रा में भाग लें और मंदिर में मिठाई अर्पित कर आशीर्वाद लें। अनुष्ठान प्रेमपूर्ण होते हैं – कोई चोट पहुँचाने का इरादा नहीं।
लठमार होली के लिए नियम
- सम्मान बनाए रखें: महिलाओं को छेड़ना या असम्मानजनक व्यवहार निषिद्ध है; यह भक्ति का उत्सव है।
- सुरक्षा उपकरण: पुरुष ढाल या हेलमेट पहनें, महिलाएँ नरम लाठियाँ ही इस्तेमाल करें।
- प्रशासनिक निर्देश: जिला मजिस्ट्रेट द्वारा सुरक्षा, भीड़ प्रबंधन के नियम पालन करें; कंट्रोल रूम से अपडेट लें।
- पर्यटक सावधानी: भीड़ अधिक, हल्के कपड़े पहनें, पानी-दवा साथ रखें; फोटोग्राफी सीमित क्षेत्रों में।
- भागीदारी वैकल्पिक: देखें या शामिल हों, लेकिन मर्यादा न भूलें।
क्यों खास है बरसाना की लठमार होली?
- यह 500 वर्षों से भी पुरानी परंपरा मानी जाती है
- विश्वभर से पर्यटक आते हैं
- यह प्रेम और हास्य का प्रतीक है
- यहाँ परंपरा और अनुशासन दोनों साथ चलते हैं
कैसे पहुँचें और सुझाव
मथुरा जंक्शन से बरसाना 25-30 किमी; बस/टैक्सी उपलब्ध। होटल पहले बुक करें, स्थानीय दुकानों से ढाल खरीदें। यह उत्सव लिंग समानता और सशक्तिकरण का प्रतीक भी है।
अगर आप 2026 में बरसाना की लठमार होली देखने की योजना बना रहे हैं, तो इन नियमों और परंपराओं को समझना जरूरी है।
यह अनुभव अद्भुत है — लेकिन तभी जब हम इसकी मर्यादा का सम्मान करें।
राधे राधे!
(डिस्क्लेमर: यह पाठ्य सामग्री आम धारणाओं और इंटरनेट पर मौजूद सामग्री के आधार पर लिखी गई है। Publicreact.in इसकी पुष्टि नहीं करता है।)
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