वृंदावन के कण-कण में प्रेम और भक्ति का वास है, और इस प्रेम की अधिष्ठात्री देवी हैं—श्री राधारानी। वैष्णव परंपरा में कहा जाता है कि भगवान श्रीकृष्ण को प्रसन्न करने का सबसे सरल और सुगम मार्ग श्री राधारानी की कृपा है। इसी कृपा को प्राप्त करने की एक दिव्य कुंजी है—”श्री राधा कृपा कटाक्ष स्तोत्र” (Shri Radha Kripa Kataksha Stotra)।
यह स्तोत्र केवल शब्दों का समूह नहीं, बल्कि भक्त के हृदय की वह पुकार है जो सीधे किशोरी जी (राधा जी) के चरणों तक पहुँचती है। इस लेख में हम इस महाशक्तिशाली स्तोत्र के महत्व, इसके रचयिता, पाठ विधि और इसके चमत्कारिक लाभों (Benefits) पर विस्तार से चर्चा करेंगे।
श्री राधा कृपा कटाक्ष स्तोत्र का भावार्थ और स्वरूप
॥ श्री राधिकायाः कृपा कटाक्ष स्तोत्र ॥
मुनीन्दवृन्दवन्दिते त्रिलोकशोकहारिणी, प्रसन्नवक्त्रपंकजे निकंजभूविलासिनी।
व्रजेन्दभानुनन्दिनी व्रजेन्द सूनुसंगते, कदा करिष्यसीह मां कृपा-कटाक्ष-भाजनम्॥ (1)
भावार्थ : समस्त मुनिगण आपके चरणों की वंदना करते हैं, आप तीनों लोकों का शोक दूर करने वाली हैं, आप प्रसन्नचित्त प्रफुल्लित मुख कमल वाली हैं, आप धरा पर निकुंज में विलास करने वाली हैं। आप राजा वृषभानु की राजकुमारी हैं, आप ब्रजराज नन्द किशोर श्री कृष्ण की चिरसंगिनी है, हे जगज्जननी श्रीराधे माँ! आप मुझे इस लोक में अपने कृपा कटाक्ष का पात्र कब बनाएंगी ?
अशोकवृक्ष वल्लरी वितानमण्डपस्थिते, प्रवालज्वालपल्लव प्रभारूणाङि्घ् कोमले।
वराभयस्फुरत्करे प्रभूतसम्पदालये, कदा करिष्यसीह मां कृपा-कटाक्ष-भाजनम्॥ (2)
भावार्थ: आप अशोक की वृक्ष-लताओं से बने हुए मंदिर में विराजमान हैं, आप सूर्य की प्रचंड अग्नि की लाल ज्वालाओं के समान कोमल चरणों वाली हैं, आप भक्तों को अभीष्ट वरदान, अभय दान देने के लिए सदैव उत्सुक रहने वाली हैं। आप के हाथ सुन्दर कमल के समान हैं, आप अपार ऐश्वर्य की भंङार स्वामिनी हैं, हे सर्वेश्वरी माँ! आप मुझे इस लोक में अपने कृपा कटाक्ष का पात्र कब बनाएंगी ?
अनंगरंगमंगल प्रसंगभंगुरभ्रुवां, सुविभ्रम ससम्भ्रम दृगन्तबाणपातनैः।
निरन्तरं वशीकृत प्रतीतनन्दनन्दने, कदा करिष्यसीह मां कृपा-कटाक्ष भाजनम्॥ (3)
भावार्थ : रास क्रीड़ा के रंगमंच पर मंगलमय प्रसंग में आप अपनी बाँकी भृकुटी से आश्चर्य उत्पन्न करते हुए सहज कटाक्ष रूपी बाणों की वर्षा करती रहती हैं। आप श्री नन्दकिशोर को निरंतर अपने बस में किये रहती हैं, हे जगज्जननी वृन्दावनेश्वरी माँ! आप मुझे इस लोक में अपने कृपा कटाक्ष का पात्र कब बनाएंगी ?
तड़ित्सुवणचम्पक प्रदीप्तगौरविगहे, मुखप्रभापरास्त-कोटिशारदेन्दुमण्ङले।
विचित्रचित्र-संचरच्चकोरशावलोचने, कदा करिष्यसीह मां कृपा-कटाक्ष भाजनम्॥ (4)
भावार्थ : आप बिजली के सदृश, स्वर्ण तथा चम्पा के पुष्प के समान सुनहरी आभा वाली हैं, आप दीपक के समान गोरे अंगों वाली हैं, आप अपने मुखारविंद की चाँदनी से शरद पूर्णिमा के करोड़ों चन्द्रमा को लजाने वाली हैं। आपके नेत्र पल-पल में विचित्र चित्रों की छटा दिखाने वाले चंचल चकोर शिशु के समान हैं, हे वृन्दावनेश्वरी माँ! आप मुझे इस लोक में अपने कृपा कटाक्ष का पात्र कब बनाएंगी ?
मदोन्मदातियौवने प्रमोद मानमणि्ते, प्रियानुरागरंजिते कलाविलासपणि्डते।
अनन्यधन्यकुंजराज कामकेलिकोविदे कदा करिष्यसीह मां कृपा-कटाक्ष-भाजनम्॥ (5)
भावार्थ : आप अपने चिर-यौवन के आनन्द के मग्न रहने वाली है, आनंद से पूरित मन ही आपका सर्वोत्तम आभूषण है, आप अपने प्रियतम के अनुराग में रंगी हुई विलासपूर्ण कला पारंगत हैं। आप अपने अनन्य भक्त गोपिकाओं से धन्य हुए निकुंज-राज के प्रेम क्रीड़ा की विधा में भी प्रवीण हैं, हे निकुँजेश्वरी माँ! आप मुझे इस लोक में अपने कृपा कटाक्ष का पात्र कब बनाएंगी ?
अशेषहावभाव धीरहीर हार भूषिते, प्रभूतशातकुम्भकुम्भ कुमि्भकुम्भसुस्तनी।
प्रशस्तमंदहास्यचूणपूणसौख्यसागरे, कदा करिष्यसीह मां कृपा-कटाक्ष भाजनम्॥ (6)
भावार्थ : आप संपूर्ण हाव-भाव रूपी श्रृंगारों से परिपूर्ण हैं, आप धीरज रूपी हीरों के हारों से विभूषित हैं, आप शुद्ध स्वर्ण के कलशों के समान अंगो वाली है, आपके पयोंधर स्वर्ण कलशों के समान मनोहर हैं। आपकी मंद-मंद मधुर मुस्कान सागर के समान आनन्द प्रदान करने वाली है, हे कृष्णप्रिया माँ! आप मुझे इस लोक में अपने कृपा कटाक्ष का पात्र कब बनाएंगी ?
मृणालबालवल्लरी तरंगरंगदोलते, लतागलास्यलोलनील लोचनावलोकने।
ललल्लुलमि्लन्मनोज्ञ मुग्ध मोहनाश्रये, कदा करिष्यसीह मां कृपा-कटाक्ष भाजनम्॥ (7)
भावार्थ : जल की लहरों से कम्पित हुए नूतन कमल-नाल के समान आपकी सुकोमल भुजाएँ हैं, आपके नीले चंचल नेत्र पवन के झोंकों से नाचते हुए लता के अग्र-भाग के समान अवलोकन करने वाले हैं। सभी के मन को ललचाने वाले, लुभाने वाले मोहन भी आप पर मुग्ध होकर आपके मिलन के लिये आतुर रहते हैं ऎसे मनमोहन को आप आश्रय देने वाली हैं, हे वृषभानुनन्दनी माँ! आप मुझे इस लोक में अपने कृपा कटाक्ष का पात्र कब बनाएंगी ?
सुवर्ण्मालिकांचिते त्रिरेखकम्बुकण्ठगे, त्रिसुत्रमंगलीगुण त्रिरत्नदीप्तिदीधिअति।
सलोलनीलकुन्तले प्रसूनगुच्छगुम्फिते, कदा करिष्यसीह मां कृपा-कटाक्ष भाजनम्॥ (8)
भावार्थ : आप स्वर्ण की मालाओं से विभूषित है, आप तीन रेखाओं युक्त शंख के समान सुन्दर कण्ठ वाली हैं, आपने अपने कण्ठ में प्रकृति के तीनों गुणों का मंगलसूत्र धारण किया हुआ है, इन तीनों रत्नों से युक्त मंगलसूत्र समस्त संसार को प्रकाशमान कर रहा है। आपके काले घुंघराले केश दिव्य पुष्पों के गुच्छों से अलंकृत हैं, हे कीरतिनन्दनी माँ! आप मुझे इस लोक में अपने कृपा कटाक्ष का पात्र कब बनाएंगी ?
नितम्बबिम्बलम्बमान पुष्पमेखलागुण, प्रशस्तरत्नकिंकणी कलापमध्यमंजुले।
करीन्द्रशुण्डदण्डिका वरोहसोभगोरुके, कदा करिष्यसीह मां कृपा-कटाक्ष भाजनम्॥ (9)
भावार्थ : आपका उर भाग में फूलों की मालाओं से शोभायमान हैं, आपका मध्य भाग रत्नों से जड़ित स्वर्ण आभूषणों से सुशोभित है। आपकी जंघायें हाथी की सूंड़ के समान अत्यन्त सुन्दर हैं, हे ब्रजनन्दनी माँ! आप मुझे कब अपनी कृपा दृष्टि से कृतार्थ करोगी ?
अनेकमन्त्रनादमंजु नूपुरारवस्खलत्, समाजराजहंसवंश निक्वणातिग।
विलोलहेमवल्लरी विडमि्बचारूचं कमे, कदा करिष्यसीह मां कृपा-कटाक्ष-भाजनम्॥ (10)
भावार्थ : आपके चरणों में स्वर्ण मण्डित नूपुर की सुमधुर ध्वनि अनेकों वेद मंत्रो के समान गुंजायमान करने वाले हैं, जैसे मनोहर राजहसों की ध्वनि गूँजायमान हो रही है। आपके अंगों की छवि चलते हुए ऐसी प्रतीत हो रही है जैसे स्वर्णलता लहरा रही है, हे जगदीश्वरी माँ! आप मुझे इस लोक में अपने कृपा कटाक्ष का पात्र कब बनाएंगी ?
अनन्तकोटिविष्णुलोक नमपदमजाचिते, हिमादिजा पुलोमजा-विरंचिजावरप्रदे।
अपारसिदिवृदिदिग्ध -सत्पदांगुलीनखे, कदा करिष्यसीह मां कृपा -कटाक्ष भाजनम्॥ (11)
भावार्थ : अनंत कोटि बैकुंठो की स्वामिनी श्रीलक्ष्मी जी आपकी पूजा करती हैं, श्रीपार्वती जी, इन्द्राणी जी और सरस्वती जी ने भी आपकी चरण वन्दना कर वरदान पाया है। आपके चरण-कमलों की एक उंगली के नख का ध्यान करने मात्र से अपार सिद्धि की प्राप्ति होती है, हे करूणामयी माँ! आप मुझे इस लोक में अपने कृपा कटाक्ष का पात्र कब बनाएंगी ?
मखेश्वरी क्रियेश्वरी स्वधेश्वरी सुरेश्वरी, त्रिवेदभारतीयश्वरी प्रमाणशासनेश्वरी।
रमेश्वरी क्षमेश्वरी प्रमोदकाननेश्वरी, ब्रजेश्वरी ब्रजाधिपे श्रीराधिके नमोस्तुते॥ (12)
भावार्थ : आप सभी प्रकार के यज्ञों की स्वामिनी हैं, आप संपूर्ण क्रियाओं की स्वामिनी हैं, आप स्वधा देवी की स्वामिनी हैं, आप सब देवताओं की स्वामिनी हैं, आप तीनों वेदों की स्वामिनी है, आप संपूर्ण जगत पर शासन करने वाली हैं। आप रमा देवी की स्वामिनी हैं, आप क्षमा देवी की स्वामिनी हैं, आप आमोद-प्रमोद की स्वामिनी हैं, हे ब्रजेश्वरी! हे ब्रज की अधीष्ठात्री देवी श्रीराधिके! आपको मेरा बारंबार नमन है।
॥ इति श्रीराधिकाया कृपा कटाक्ष स्तोत्र सम्पूर्णम ॥
राधा कृपा कटाक्ष स्तोत्र का उद्गम और इतिहास
धर्मग्रंथों और संतों के अनुसार, इस दुर्लभ स्तोत्र का वर्णन ‘ऊर्ध्वाम्नाय तंत्र’ (Urdhvamnaya Tantra) में मिलता है। मान्यता है कि स्वयं भगवान शिव ने माता पार्वती को यह स्तोत्र सुनाया था। महादेव, जो कि परम वैष्णव हैं, जानते थे कि कृष्ण भक्ति का सर्वोच्च शिखर ‘राधा दास्य’ (राधा की सेवा) है। इसीलिए उन्होंने इस स्तोत्र के माध्यम से जगत को बताया कि कैसे राधारानी की एक ‘कृपा कटाक्ष’ (दया भरी तिरछी नज़र) भक्त के समस्त पापों को भस्म कर सकती है।
इस स्तोत्र में श्री राधारानी के रूप, सौंदर्य और ऐश्वर्य का अद्भुत वर्णन है। इसमें उन्हें ‘मुनीन्द्रवृन्दवन्दिते’ (मुनियों द्वारा पूजित) और ‘त्रिलोकशोकहारिणी’ (तीनों लोकों का शोक हरने वाली) कहा गया है। यह स्तोत्र भक्त को यह अहसास दिलाता है कि वह अपनी सामर्थ्य से नहीं, बल्कि केवल राधा जी की करुणा से ही ब्रज-रस को प्राप्त कर सकता है।

श्री राधा कृपा कटाक्ष स्तोत्र के चमत्कारिक लाभ (Benefits of Radha Kripa Kataksha)
शास्त्रों में इस स्तोत्र की ‘फलश्रुति’ (Benefits) का बहुत विस्तार से वर्णन किया गया है। जो साधक सच्चे हृदय से इसका पाठ करता है, उसे निम्नलिखित आध्यात्मिक और भौतिक लाभ प्राप्त होते हैं:
संचित कर्मों का नाश: यह स्तोत्र पूर्व जन्मों के संचित पापों (Sanchita Karma) को नष्ट करने की शक्ति रखता है।
कृष्ण प्रेम की प्राप्ति: मान्यता है कि जो राधा जी को प्रसन्न कर लेता है, श्रीकृष्ण उसे स्वतः ही अपना लेते हैं। यह स्तोत्र “व्रजेन्द्र-सूनु-मंडल-प्रवेशनम्” (कृष्ण के नित्य लीला मंडल में प्रवेश) का अधिकार दिलाता है।
मनोकामना पूर्ति: धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष—जीवन के चारों पुरुषार्थों की सिद्धि इस पाठ से सुलभ हो जाती है।
राधा कुंड का विशेष नियम: फलश्रुति में एक विशेष रहस्य बताया गया है। यदि कोई साधक राधा कुंड (Radha Kund) के जल में (कमर, नाभि या कंठ तक) खड़े होकर अष्टमी, चतुर्दशी या पूर्णिमा के दिन इसका 100 बार पाठ करता है, तो उसे साक्षात् राधारानी के दर्शन या उनकी प्रत्यक्ष अनुभूति प्राप्त हो सकती है।
पाठ करने की सही विधि (Path Vidhi)
इस स्तोत्र का पूर्ण लाभ उठाने के लिए इसे सही विधि और भाव के साथ पढ़ना आवश्यक है।
चरण निर्देश
- समय (Time) ब्रह्म मुहूर्त (सुबह 4-6 बजे) या संध्या काल (गोधूलि बेला) सर्वश्रेष्ठ है।
- आसन (Posture) पूर्व या उत्तर दिशा की ओर मुख करके कुशा या ऊनी आसन पर बैठें।
- चित्र (Idol) अपने सामने राधा-कृष्ण का एक सुंदर विग्रह या चित्र स्थापित करें।
- शुद्धि (Purity) स्नान करके स्वच्छ वस्त्र धारण करें। मानसिक पवित्रता सबसे अधिक महत्वपूर्ण है।
- विशेष तिथियां राधा अष्टमी (Radha Ashtami), शरद पूर्णिमा, एकादशी और शुक्रवार।
नोट: पाठ शुरू करने से पहले तुलसी जी को प्रणाम करें और अपने गुरुदेव का स्मरण करें। उच्चारण शुद्ध रखें, यदि संस्कृत पढ़ने में कठिनाई हो, तो आप इसका हिंदी अनुवाद (Hindi Meaning) भी भावपूर्वक पढ़ सकते हैं।
“श्री राधा कृपा कटाक्ष स्तोत्र” कलयुग में भगवत प्राप्ति का एक सरल नौका है। जब हम अपनी सारी युक्तियाँ और अहंकार छोड़कर लाड़ली जू के चरणों में गिरकर कहते हैं—”हे राधे! बस एक बार मेरी ओर देख लो”, तो करणामयी किशोरी जी अपने भक्त को अनदेखा नहीं कर पातीं।
यदि आप अपने जीवन में शांति, भक्ति और प्रेम का प्रकाश चाहते हैं, तो नित्य नियम से इस स्तोत्र का पाठ आरंभ करें। कुछ ही दिनों में आप अपने जीवन में एक दिव्य सकारात्मकता का अनुभव करेंगे।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs about Radha Kripa Kataksha Stotra)
यहाँ श्री राधा कृपा कटाक्ष स्तोत्र से जुड़े भक्तों के मन में उठने वाले सामान्य प्रश्नों के उत्तर दिए गए हैं:
Q1. राधा कृपा कटाक्ष स्तोत्र की रचना किसने की थी? (Who wrote Radha Kripa Kataksha Stotra?)
उत्तर: इस स्तोत्र की रचना स्वयं भगवान शिव (Lord Shiva) ने की थी। शास्त्रों के अनुसार, ‘ऊर्ध्वाम्नाय तंत्र’ (Urdhvamnaya Tantra) में महादेव ने माता पार्वती जी को यह स्तोत्र सुनाया था। यह स्तोत्र श्री राधारानी जी को प्रसन्न करने का सबसे प्रामाणिक और शक्तिशाली माध्यम माना जाता है।
Q2. क्या राधा कृपा कटाक्ष स्तोत्र का पाठ महिलाएं मासिक धर्म (Periods) में कर सकती हैं?
उत्तर: वैदिक परंपरा और शुद्धता के नियमों के अनुसार, मासिक धर्म के दौरान किसी भी स्तोत्र का वाचिक पाठ (बोलकर पढ़ना) या ग्रंथ को स्पर्श करना वर्जित माना जाता है। हालांकि, आप इस दौरान मानसिक पाठ (मन ही मन दोहराना) कर सकती हैं या मोबाइल/स्पीकर पर इसका श्रवण (सुनना) कर सकती हैं। ‘नाम जप’ (राधा नाम) में कोई नियम नहीं है, लेकिन स्तोत्र पाठ के लिए शारीरिक शुद्धि आवश्यक है।
Q3. राधा कृपा कटाक्ष स्तोत्र का पाठ कितनी बार करना चाहिए?
उत्तर: सामान्य नित्य नियम के लिए आप प्रतिदिन 1 या 3 बार इसका पाठ कर सकते हैं। विशेष मनोकामना पूर्ति के लिए 108 बार पाठ करने का विधान है। शास्त्रों में उल्लेख है कि यदि कोई साधक राधा कुंड (Radha Kund) के जल में खड़े होकर 108 बार इसका पाठ करता है, तो उसे साक्षात् राधारानी जी की कृपा और दर्शन प्राप्त होते हैं।
Q4. ‘कृपा कटाक्ष’ (Kripa Kataksha) शब्द का अर्थ क्या है?
उत्तर: ‘कृपा’ का अर्थ है दया और ‘कटाक्ष’ का अर्थ है ‘तिरछी चितवन’ (Side-long glance)। अतः राधा कृपा कटाक्ष का अर्थ है—श्री राधारानी की वह करुणामयी तिरछी नज़र, जो जिस भक्त पर पड़ जाए, उसका जीवन और मरण दोनों सुधर जाते हैं
Q5. क्या हम रात में राधा कृपा कटाक्ष स्तोत्र का पाठ कर सकते हैं?
उत्तर: हाँ, आप संध्या या रात्रि में इसका पाठ कर सकते हैं। हालांकि, ब्रह्म मुहूर्त (सुबह 4:00 से 6:00 बजे) का समय सर्वश्रेष्ठ माना जाता है क्योंकि तब वातावरण शांत और सात्विक होता है। यदि आप व्यस्त हैं, तो गोधूलि बेला (शाम) या सोने से पहले भी इसका पाठ करना लाभकारी है。
Q6. क्या इस स्तोत्र के पाठ के लिए दीक्षा (Initiation) लेना अनिवार्य है?
उत्तर: नहीं, यह एक स्तुति गान है, बीज मंत्र नहीं। इसलिए, इसके पाठ के लिए गुरु दीक्षा अनिवार्य नहीं है। कोई भी व्यक्ति, चाहे वह दीक्षित हो या न हो, शुद्ध भाव और प्रेम से राधारानी की प्रसन्नता के लिए इसका पाठ कर सकता है。
जय जय श्री राधे!
(डिस्क्लेमर: यह पाठ्य सामग्री आम धारणाओं और इंटरनेट पर मौजूद सामग्री के आधार पर लिखी गई है। Publicreact.in इसकी पुष्टि नहीं करता है।)
नोट: हमारे द्वारा उपरोक्त लेख में अगर आपको कोई त्रुटि दिखे या फिर लेख को बेहतर बनाने के आपके कुछ सुझाव है तो कृपया हमें कमेंट या फिर ईमेल के द्वारा बता सकते है हम आपके सुझावों को प्राथिमिकता के साथ उसे अपनाएंगे धन्यवाद !



