भारतीय साहित्य और भक्ति परंपरा के आकाश में ‘गीत गोविन्द’ (Geet Govind) एक ध्रुव तारे की तरह चमकता है। 12वीं शताब्दी में महाकवि जयदेव द्वारा रचित यह संस्कृत महाकाव्य न केवल शब्दों का जादू है, बल्कि जीवात्मा (श्री राधा) और परमात्मा (श्री कृष्ण) के मिलन की एक दिव्य यात्रा है।
ओडिशा के पुरी में रचे गए इस ग्रंथ ने न केवल वैष्णव भक्ति आंदोलन को नई दिशा दी, बल्कि भारतीय संगीत और नृत्य (विशेषकर ओडिसी) की आत्मा बन गया। ‘गीत गोविन्द’ में श्रीकृष्ण और श्री राधारानी के प्रेम, विरह, मान और मिलन का इतना सजीव चित्रण है कि इसे पढ़ने या सुनने वाला भक्त खुद को वृंदावन की कुंज गलियों में महसूस करने लगता है।
गीत गोविन्द ( Geet Govindam)
श्रितकमलाकुचमण्डल धृतकुण्डल ए।
कलितललितवनमाल जय जय देव हरे॥
दिनमणिमण्डलमण्डन भवखण्डन ए।
मुनिजनमानसहंस जय जय देव हरे ॥
कालियविषधरगंजन जनरंजन ए।
यदुकुलनलिनदिनेश जय जय देव हरे ॥
मधुमुरनरकविनाशन गरुडासन ए।
सुरकुलकेलिनिदान जय जय देव हरे ॥
अमलकमलदललोचन भवमोचन ए।
त्रिभुवनभवननिधान जय जय देव हरे ॥
जनकसुताकृतभूषण जितदूषण ए।
समरशमितदशकण्ठ जय जय देव हरे ॥
अभिनवजलधरसुन्दर धृतमन्दर ए।
श्रीमुखचन्द्रचकोर जय जय देव हरे ॥
तव चरणे प्रणता वयमिति भावय ए।
कुरु कुशलंव प्रणतेषु जय जय देव हरे ॥
श्रीजयदेवकवेरुदितमिदं कुरुते मृदम् ।
मंगलमंजुलगीतं जय जय देव हरे ॥
राधे कृष्णा हरे गोविंद गोपाला नन्द जू को लाला ।
यशोदा दुलाला जय जय देव हरे ॥
गीत गोविन्द के रचयिता: महाकवि जयदेव और पद्मावती
जयदेव जी का जन्म ओडिशा के केंदुली सासन गांव में हुआ था। वे भगवान जगन्नाथ के परम भक्त थे। किंवदंतियों के अनुसार, उनका विवाह पद्मावती नामक एक नर्तकी से हुआ था, जो भगवान जगन्नाथ की सेवा में समर्पित थीं।
ऐसा कहा जाता है कि जब जयदेव जी ‘गीत गोविन्द’ के पदों की रचना करते थे, तो उनकी पत्नी पद्मावती उन पदों पर नृत्य करती थीं। यह काव्य केवल स्याही से नहीं, बल्कि भक्ति और प्रेम के रस में डूबकर लिखा गया था। यही कारण है कि आज भी जगन्नाथ मंदिर, पुरी में प्रतिदिन रात को सोने से पहले भगवान को ‘गीत गोविन्द’ सुनाने की परंपरा 700 वर्षों से चली आ रही है।
संरचना और विषय (Structure and Theme)
‘गीत गोविन्द’ में कुल 12 सर्ग (Chapters) और 24 प्रबंध (Songs/Prabandhas) हैं। ये प्रबंध ‘अष्टपदी’ (Ashtapadi) कहलाते हैं क्योंकि इनमें आठ पद होते हैं।
इस काव्य का मुख्य विषय ‘राधा-कृष्ण का प्रेम’ है, लेकिन यह साधारण मानवीय प्रेम नहीं है।
- विरह (Separation): राधा का कृष्ण के लिए तड़पना जीवात्मा की परमात्मा से दूर होने की पीड़ा को दर्शाता है।
- मिलन (Union): अंत में श्री राधा और श्री कृष्ण का मिलन आत्मा का मोक्ष और ईश्वरीय आनंद में विलीन होना है।
‘देहि पद पल्लव मुदारम्’ का दिव्य रहस्य
‘गीत गोविन्द’ से जुड़ी सबसे प्रसिद्ध कथा 10वें सर्ग की है। श्री जयदेव जी लिख रहे थे कि श्रीकृष्ण राधा जी के मान को तोड़ने के लिए उनके पैरों में गिरना चाहते हैं। जयदेव जी की कलम रुक गई। उन्हें लगा कि त्रिभुवन के स्वामी, भगवान श्रीकृष्ण को राधारानी के चरणों में झुकाना पाप होगा।
वे उस श्लोक को अधूरा छोड़कर स्नान करने चले गए। उनकी अनुपस्थिति में स्वयं भगवान श्रीकृष्ण, जयदेव का रूप धरकर आए और उस अधूरे श्लोक को पूरा कर दिया:
स्मर-गरल-खण्डनं मम शिरसि मण्डनं देहि पद-पल्लवमुदारम्।
(अर्थ: कामदेव के विष को नष्ट करने के लिए, मेरे सिर पर अपने कोमल चरणों को आभूषण की तरह रख दो।)
जब जयदेव वापस आए और उन्होंने देखा कि श्लोक पूरा हो गया है, तो वे समझ गए कि स्वयं प्रभु ने आकर अपनी मुहर लगा दी है कि प्रेम में भक्त भगवान से भी बड़ा हो जाता है।

आध्यात्मिक महत्व (Spiritual Significance)
कई विद्वान ‘गीत गोविन्द’ को केवल श्रृंगार रस का काव्य मानते हैं, लेकिन संतों की दृष्टि में यह शुद्ध भक्ति रस है।
- राधा: जीवात्मा (भक्त) का प्रतीक हैं।
- कृष्ण: परमात्मा का प्रतीक हैं।
- सखी: गुरु का प्रतीक है, जो विरही आत्मा (राधा) को परमात्मा (कृष्ण) से मिलाने का मार्ग दिखाती है।
यह ग्रंथ हमें सिखाता है कि ईश्वर को पाने के लिए ज्ञान या योग की नहीं, बल्कि ‘राधा’ जैसे निश्छल और तीव्र प्रेम (Premananda) की आवश्यकता है।
सांस्कृतिक प्रभाव
‘गीत गोविन्द’ ने भारत की कला और संस्कृति पर अमिट छाप छोड़ी है:
- शास्त्रीय नृत्य: ओडिसी, भरतनाट्यम, कथक और मणिपुरी नृत्यों में अष्टपदियों पर अभिनय करना नृत्य का चरम माना जाता है।
- चित्रकला: बसोहली, कांगड़ा और मेवाड़ शैलियों में गीत गोविन्द के प्रसंगों पर हजारों सुंदर चित्र बनाए गए हैं।
- संगीत: सोपान संगीत (केरल) और ओडिसी संगीत में इसका गायन प्रमुख है। “ललित लवंग लता” (Lalit Lavang Lata) आज भी भारतीय शास्त्रीय संगीत का एक रत्न है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs about Geet Govindam)
Q1. गीत गोविन्द की रचना किस भाषा में हुई है?
उत्तर: गीत गोविन्द की रचना संस्कृत (Sanskrit) भाषा में हुई है। इसकी भाषा अत्यंत मधुर, गेय (गाने योग्य) और कोमल कांत पदावली से युक्त है।
Q2. ‘अष्टपदी’ (Ashtapadi) किसे कहते हैं?
उत्तर: गीत गोविन्द के प्रत्येक गीत (Song) में आठ पद (Stanzas) होते हैं, इसलिए इन्हें ‘अष्टपदी’ कहा जाता है। पूरे ग्रंथ में ऐसी 24 अष्टपदियाँ हैं।
Q3. जयदेव किस राजा के दरबारी कवि थे?
उत्तर: जयदेव बंगाल के राजा लक्ष्मण सेन (Lakshman Sen) के दरबार के ‘पंचरत्न’ कवियों में से एक माने जाते हैं, जो 12वीं शताब्दी में शासन करते थे।
Q4. क्या गीत गोविन्द का पाठ घर में किया जा सकता है?
उत्तर: जी हाँ, यह एक अत्यंत पवित्र और भक्तिपूर्ण ग्रंथ है। इसका पाठ या श्रवण करने से घर में प्रेम और सकारात्मकता का वातावरण बनता है। विशेषकर वसंत ऋतु और झूलन उत्सव के दौरान इसका पाठ बहुत शुभ माना जाता है।
Q5. गीत गोविन्द का सबसे प्रसिद्ध भजन कौन सा है?
उत्तर: इसकी पहली अष्टपदी “प्रलय पयोधि जले” (दशावतार स्तोत्र) और “ललित लवंग लता” (वसंत वर्णन) सबसे अधिक प्रसिद्ध और गाए जाने वाले पद हैं।
‘गीत गोविन्द’ केवल एक पुस्तक नहीं, बल्कि एक अनुभव है। यह हमें याद दिलाता है कि ईश्वर कठोर तपस्या से नहीं, बल्कि मधुर प्रेम से रीझते हैं। यदि आप भी उस दिव्य प्रेम का अनुभव करना चाहते हैं, तो ‘गीत गोविन्द’ के श्लोकों को सुनें और उनके भाव में डूब जाएं।
जय जय देव हरे!
(डिस्क्लेमर: यह पाठ्य सामग्री आम धारणाओं और इंटरनेट पर मौजूद सामग्री के आधार पर लिखी गई है। Publicreact.in इसकी पुष्टि नहीं करता है।)
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