गणतंत्र दिवस परेड के बारे में 4 आश्चर्यजनक तथ्य जो आप शायद नहीं जानते होंगे
हर साल 26 जनवरी को करोड़ों भारतीय अपने टेलीविज़न स्क्रीन पर गणतंत्र दिवस परेड देखने के लिए बैठते हैं। भव्य झांकियाँ, अनुशासित सैन्य दल और रोमांचक फ्लाई-पास्ट हमारी वार्षिक परंपरा का एक परिचित हिस्सा हैं। लेकिन क्या आप जानते हैं कि इस जानी-पहचानी परंपरा के पीछे एक आकर्षक इतिहास छिपा है, जिसमें कई ऐसे आश्चर्यजनक तथ्य हैं जो ज्यादातर लोगों को नहीं पता?
यह लेख केवल परेड के वैभव को दोहराने के लिए नहीं है। हम ऐतिहासिक अभिलेखों के आधार पर आपको इस राष्ट्रीय उत्सव के बारे में चार ऐसे रोचक और अनसुने तथ्य बताएंगे, जो इस आयोजन को देखने का आपका नजरिया हमेशा के लिए बदल सकते हैं।

1: परेड हमेशा कर्तव्य पथ (राजपथ) पर नहीं होती थी!
यह जानकर आपको शायद हैरानी होगी, लेकिन गणतंत्र दिवस परेड हमेशा से अपने वर्तमान प्रतिष्ठित स्थान पर नहीं होती थी। 1950 से लेकर 1954 तक, परेड दिल्ली के अलग-अलग स्थानों पर आयोजित की गई थी।
ऐतिहासिक रिकॉर्ड के अनुसार, शुरुआती परेड के आयोजन स्थल इस प्रकार थे:
- 1950: सबसे पहली परेड इरविन स्टेडियम में हुई थी, जिसे आज हम मेजर ध्यानचंद नेशनल स्टेडियम के नाम से जानते हैं।
- बाद के वर्ष: इसके बाद के परेड किंग्सवे कैंप और रामलीला मैदान जैसी जगहों पर भी आयोजित किए गए।
1954 से इस परेड को स्थायी रूप से राजपथ (अब कर्तव्य पथ) पर आयोजित किया जाने लगा। यह तथ्य दिखाता है कि कैसे यह आयोजन एक अपेक्षाकृत छोटे समारोह से विकसित होकर उस भव्य और प्रतिष्ठित जुलूस में बदल गया, जिसे हम आज जानते हैं।
2: पहली परेड आज की परेड से बहुत अलग थी
1950 में हुई पहली गणतंत्र दिवस परेड आज के समारोह से काफी अलग थी। इसमें वे कई तत्व शामिल नहीं थे जिन्हें आज हम परेड की पहचान मानते हैं।
- कोई झाँकी नहीं थी: पहली परेड में राज्यों की रंग-बिरंगी झाँकियाँ शामिल नहीं थीं। यह पूरी तरह से सैन्य शक्ति का प्रदर्शन था, जिसमें भारतीय सेना के तीनों बलों के 3,000 जवानों ने हिस्सा लिया था। राज्यों के बीच एकता और स्वस्थ प्रतिस्पर्धा को बढ़ावा देने के उद्देश्य से झाँकियों को पहली बार 1953 में शामिल किया गया।
- 31 तोपों की सलामी: एक और आश्चर्यजनक तथ्य यह है कि पहली परेड में 31 तोपों की सलामी दी गई थी। बाद के वर्षों में इस संख्या को घटाकर 21 कर दिया गया, जो आज तक जारी है।
उस ऐतिहासिक दिन पर, भारत के पहले गवर्नर-जनरल, चक्रवर्ती राजगोपालाचारी ने भारत को एक संप्रभु, लोकतांत्रिक गणराज्य घोषित किया, जिससे देश के एक नए युग का सूत्रपात हुआ। इसके कुछ ही मिनटों बाद, डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने भारत के पहले राष्ट्रपति के रूप में शपथ ली।
3: 1975 की परेड: महिला शक्ति के नाम एक ऐतिहासिक वर्ष
गणतंत्र की रजत जयंती (सिल्वर जुबली) का वर्ष, 1975, भारत की सशस्त्र और पुलिस बलों में महिलाओं की भागीदारी के लिए एक मील का पत्थर साबित हुआ।
- पहला महिला दस्ता: यह पहला अवसर था जब सेना, नौसेना और वायु सेना की महिला अधिकारियों के एक संयुक्त दस्ते ने परेड में हिस्सा लिया। 148 महिला सैन्य अधिकारियों के इस दस्ते ने परेड में शामिल होकर इतिहास रच दिया। इस ऐतिहासिक क्षण का नेतृत्व तीन असाधारण महिला अधिकारियों ने किया: सेना के दस्ते का नेतृत्व कैप्टन दिव्या अजीत ने, नौसेना के दस्ते का नेतृत्व लेफ्टिनेंट कमांडर संध्या चौहान ने, और वायु सेना के दस्ते का नेतृत्व स्क्वाड्रन लीडर स्नेहा शेखावत ने किया।
- डॉ. किरण बेदी का नेतृत्व: इसी वर्ष, भारत की पहली महिला IPS अधिकारी, डॉ. किरण बेदी ने दिल्ली पुलिस के दस्ते का नेतृत्व किया। उस समय वह केवल 26 वर्ष की एक युवा ACP थीं, और उनका यह कदम पूरे देश के लिए प्रेरणा का स्रोत बना।
यह वर्ष वास्तव में भारत में महिला सशक्तिकरण की यात्रा में एक महत्वपूर्ण मोड़ था, जिसने भविष्य में महिलाओं के लिए अनगिनत दरवाजे खोले।
26 जनवरी की तारीख क्यों चुनी गई?
यह सवाल अक्सर पूछा जाता है: जब भारत 15 अगस्त को स्वतंत्र हुआ, तो गणतंत्र दिवस के लिए 26 जनवरी की तारीख ही क्यों चुनी गई? इसका जवाब भारत के स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में छिपा है।
इस तारीख को भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस द्वारा 26 जनवरी, 1930 को की गई “पूर्ण स्वराज” (पूर्ण स्व-शासन) की घोषणा का सम्मान करने के लिए चुना गया था। उस दिन, कांग्रेस ने ब्रिटिश शासन से पूरी तरह से स्वतंत्रता का संकल्प लिया था।
1930 से लेकर 1947 में वास्तविक स्वतंत्रता मिलने तक, पूरे देश में 26 जनवरी को ही ‘स्वतंत्रता दिवस’ के रूप में मनाया जाता था। जब भारत का संविधान तैयार हुआ, तो इस ऐतिहासिक दिन को स्थायी महत्व देने के लिए इसे 26 जनवरी, 1950 को लागू करने का निर्णय लिया गया। इस प्रकार, 1930 में देखा गया एक संप्रभु गणराज्य का सपना अंततः साकार हुआ।
गणतंत्र दिवस परेड केवल एक वार्षिक समारोह नहीं है; यह भारत के विकास की कहानी कहती एक जीवंत ऐतिहासिक पुस्तक है। यह हमें याद दिलाती है कि परेड का हर पहलू—स्थान, प्रतिभागी और परंपराएं—एक यात्रा का प्रतीक है। ये ऐतिहासिक तथ्य आज के भव्य आयोजन में और भी गहरा अर्थ जोड़ते हैं।
अगली बार जब आप गणतंत्र दिवस की परेड देखेंगे, तो क्या आप इन ऐतिहासिक पलों को याद करके इसे एक नई नज़र से नहीं देखेंगे?
(डिस्क्लेमर: यह पाठ्य सामग्री आम धारणाओं और इंटरनेट पर मौजूद सामग्री के आधार पर लिखी गई है। Publicreact.in इसकी पुष्टि नहीं करता है।)
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