सनातन धर्म में एकादशी तिथि का अत्यंत पवित्र और विशेष महत्त्व है। प्रत्येक मास में दो एकादशियाँ आती हैं — एक शुक्ल पक्ष में और एक कृष्ण पक्ष में। इन चौबीस एकादशियों में से प्रत्येक का अपना एक अलग नाम, महत्त्व और फल है। इन में से एक अत्यंत फलदायी और पापनाशक एकादशी है — अपरा एकादशी। यह एकादशी ज्येष्ठ मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी तिथि को मनाई जाती है।
“अपरा” शब्द का अर्थ है — अपार, असीमित या अतुलनीय। अर्थात् इस व्रत का फल इतना विशाल और असीमित है कि उसे शब्दों में पूरी तरह वर्णित नहीं किया जा सकता। इसे अचला एकादशी के नाम से भी जाना जाता है। शास्त्रों के अनुसार इस एकादशी का व्रत करने से जाने-अनजाने में हुए समस्त पापों का नाश होता है और व्यक्ति को इस लोक में सुख-समृद्धि तथा परलोक में मोक्ष की प्राप्ति होती है।
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अपरा एकादशी का समय और तिथि
अपरा एकादशी ज्येष्ठ माह के कृष्ण पक्ष की एकादशी को मनाई जाती है। यह पर्व प्रायः मई या जून के महीने में आता है। हिंदू पंचांग के अनुसार एकादशी तिथि के प्रारंभ और समाप्ति के आधार पर व्रत की तिथि निर्धारित की जाती है। उदया तिथि को ही एकादशी व्रत का पालन किया जाता है।
व्रत का पारण अगले दिन द्वादशी तिथि को, सूर्योदय के पश्चात्, द्वादशी समाप्त होने से पहले किया जाता है। यदि द्वादशी तिथि संक्षिप्त हो तो ब्राह्मण मुहूर्त में भी पारण किया जा सकता है।
अपरा एकादशी 2026 की तिथि
- व्रत तिथि: 13 मई 2026, बुधवार.
- एकादशी तिथि प्रारंभ: 12 मई 2026, दोपहर 02:52 बजे.
- एकादशी तिथि समाप्त: 13 मई 2026, दोपहर 01:29 बजे.
- पारण समय: 14 मई 2026, सुबह 05:31 बजे से 08:14 बजे तक.
एकादशी पूजा विधि
- प्रातःकाल ब्राह्म मुहूर्त में उठें और दैनिक क्रियाओं से निवृत्त होकर स्नान करें। यदि संभव हो तो गंगाजल या तुलसी मिले जल से स्नान करें।
- व्रत का संकल्प लें — भगवान विष्णु के सम्मुख हाथ में जल, फूल और अक्षत लेकर व्रत का संकल्प बोलें।
- भगवान विष्णु की पूजा करें — पीले वस्त्र पहनकर पूजा स्थल को गंगाजल से शुद्ध करें। भगवान विष्णु या श्रीकृष्ण की मूर्ति या तस्वीर स्थापित करें। पंचोपचार या षोडशोपचार विधि से पूजन करें।
- पूजन सामग्री — तुलसीदल, पीले पुष्प, धूप, दीप, नैवेद्य (पंचामृत, फल, मिठाई), चंदन, रोली, अक्षत अर्पित करें। तुलसी भगवान विष्णु को अत्यंत प्रिय है, अतः तुलसी के बिना पूजा अधूरी मानी जाती है।
- विष्णु सहस्रनाम या एकादशी माहात्म्य का पाठ करें।
- कथा श्रवण — अपरा एकादशी की कथा पढ़ें या सुनें।
- दिनभर उपवास — फलाहार या निर्जला व्रत रखें। मन में भगवान का स्मरण करते रहें।
- रात्रि जागरण — संभव हो तो रात में भजन-कीर्तन और भगवान विष्णु के नामस्मरण में जागरण करें।
- द्वादशी को पारण — अगले दिन ब्राह्मण को भोजन और दान-दक्षिणा देकर व्रत का पारण करें।
अपरा एकादशी पर क्या न करें
व्रत के दौरान कुछ बातों का विशेष ध्यान रखना चाहिए:
- चावल का सेवन न करें — एकादशी को चावल खाना वर्जित माना जाता है।
- क्रोध, झूठ और निंदा से बचें।
- तामसिक भोजन जैसे प्याज, लहसुन और माँस का त्याग करें।
- व्यर्थ की बातों और विवाद से दूर रहें।
- दांतों में लकड़ी का दातुन न करें, नींबू या नमक का प्रयोग न करें।
- परनिंदा और असत्य वचन से परहेज करें।
अपरा एकादशी की पौराणिक कथा
युधिष्ठिर ने पूछा, “हे भगवन! ज्येष्ठ कृष्ण एकादशी का क्या नाम है और उसका माहात्म्य क्या है? कृपा करके बताइए।”
भगवान श्रीकृष्ण बोले, “हे राजन! यह एकादशी ‘अचला’ और ‘अपरा’ — इन दो नामों से प्रसिद्ध है। पुराणों के अनुसार ज्येष्ठ कृष्ण पक्ष की यह एकादशी अपरा एकादशी कहलाती है, क्योंकि यह अपार धन, पुण्य और फल देने वाली है। जो मनुष्य इस व्रत को श्रद्धापूर्वक करते हैं, वे संसार में प्रसिद्ध होते हैं।”
श्रीकृष्ण ने आगे कहा, “इस दिन भगवान त्रिविक्रम की पूजा की जाती है। अपरा एकादशी का व्रत ब्रह्महत्या, भूतयोनि, निंदा, परस्त्रीगमन, झूठी गवाही, झूठ, झूठे शास्त्रों का निर्माण, झूठा ज्योतिषी बनना और झूठा वैद्य बनना जैसे अनेक पापों का नाश करता है।”
“जो क्षत्रिय युद्धभूमि से भाग जाता है, वह नरकगामी होता है; परंतु अपरा एकादशी व्रत के प्रभाव से वह भी स्वर्ग प्राप्त करता है। जो शिष्य गुरु से शिक्षा लेकर उनकी निंदा करता है, वह भी नरक में जाता है, किंतु इस व्रत से उस पाप से मुक्त हो सकता है।”
“तीनों पुष्कर में कार्तिक पूर्णिमा को स्नान करने, गंगा तट पर पितरों को पिंडदान करने, मकर संक्रांति पर प्रयागराज स्नान करने, शिवरात्रि व्रत करने, सिंह राशि के बृहस्पति में गोमती स्नान करने, कुंभ में केदारनाथ-बद्रीनाथ के दर्शन करने, सूर्यग्रहण में कुरुक्षेत्र स्नान करने, स्वर्णदान करने अथवा अर्द्धप्रसूता गौदान करने से जो फल मिलता है, वही फल अपरा एकादशी व्रत से प्राप्त होता है।”
“यह व्रत पापरूपी वृक्ष को काटने वाली कुल्हाड़ी है, पापरूपी ईंधन को जलाने वाली अग्नि है, पापरूपी अंधकार को दूर करने वाला सूर्य है और मृगों को मारने वाला सिंह है। इसलिए मनुष्य को पापों से डरते हुए इस व्रत को अवश्य करना चाहिए। अपरा एकादशी का व्रत और भगवान का पूजन करने से मनुष्य सभी पापों से मुक्त होकर विष्णुलोक को प्राप्त होता है।”
इसके बाद भगवान श्रीकृष्ण ने इसकी प्रचलित कथा सुनाई।
प्राचीन काल में महीध्वज नामक एक धर्मात्मा राजा था। उसका छोटा भाई वज्रध्वज अत्यंत क्रूर, अधर्मी और अन्यायी था। वह अपने बड़े भाई से द्वेष रखता था। एक दिन उसने रात्रि में अपने बड़े भाई की हत्या कर दी और उसकी देह को एक जंगली पीपल के नीचे गाड़ दिया।
अकाल मृत्यु के कारण राजा प्रेतात्मा बन गया और उसी पीपल के पेड़ पर रहने लगा। वह अनेक प्रकार के उत्पात करने लगा।
एक दिन ऋषि धौम्य उधर से गुजरे। उन्होंने प्रेत को देखा और अपने तपोबल से उसके पूर्व जन्म और दुर्दशा का कारण जान लिया। दयालु ऋषि ने प्रेत को पीपल के वृक्ष से मुक्त किया और उसे परलोक-विद्या का उपदेश दिया। फिर ऋषि ने राजा की प्रेतयोनि से मुक्ति के लिए स्वयं अपरा (अचला) एकादशी का व्रत किया और उस व्रत का पुण्य उस प्रेतात्मा को अर्पित कर दिया। उस पुण्य के प्रभाव से राजा की प्रेतयोनि समाप्त हो गई। वह दिव्य देह धारण कर पुष्पक विमान से स्वर्गलोक चला गया।
अंत में भगवान श्रीकृष्ण बोले, “हे राजन! मैंने यह अपरा एकादशी की कथा लोकहित के लिए कही है। जो इसे पढ़ता या सुनता है, वह सभी पापों से मुक्त हो जाता है।”
अपरा एकादशी का धार्मिक महत्त्व
ब्रह्माण्ड पुराण और पद्म पुराण में अपरा एकादशी की महिमा का विस्तार से वर्णन किया गया है। शास्त्रों के अनुसार इस एकादशी के व्रत का फल इतना अपार है कि —
- ब्रह्महत्या जैसे महापाप का भी नाश हो जाता है।
- गुरु की निंदा, झूठ बोलना, छल-कपट जैसे दोष दूर होते हैं।
- भूत-प्रेत योनि में भटकती आत्माओं को मुक्ति मिलती है।
- पितरों की आत्मा को शांति प्राप्त होती है।
- इस व्रत को करने से काशी में मृत्यु, गंगा स्नान और सूर्यग्रहण के दान के समान पुण्य की प्राप्ति होती है।

भगवान विष्णु को एकादशी तिथि अत्यंत प्रिय है। इस दिन भगवान विष्णु की भक्ति से प्रसन्न होकर वे अपने भक्तों की समस्त मनोकामनाएँ पूर्ण करते हैं।
अपरा एकादशी सनातन धर्म की उस अमूल्य परंपरा का हिस्सा है जो मनुष्य को पाप से पुण्य की ओर, अज्ञान से ज्ञान की ओर और बंधन से मुक्ति की ओर ले जाती है। यह व्रत हमें यह संदेश देता है कि भले ही हमसे जाने-अनजाने पाप हुए हों, भगवान की भक्ति और सच्चे मन से किया गया व्रत उन सभी पापों को धो सकता है।
जो व्यक्ति इस एकादशी का व्रत पूर्ण श्रद्धा, भक्ति और नियमनिष्ठा के साथ करता है, उसे इस जन्म में सुख, यश और समृद्धि की प्राप्ति होती है और मृत्यु के पश्चात् वह भगवान विष्णु के परम धाम वैकुण्ठ को प्राप्त करता है।
आइए, इस पवित्र अपरा एकादशी पर भगवान श्री हरि विष्णु के चरणों में अपना मस्तक नवाएँ और उनकी कृपा का पात्र बनें।
“एकादश्यां निराहारो यो भवेद् भक्तिसंयुतः।
स याति परमं स्थानं यत्र देवो जनार्दनः॥”
अर्थात् — जो व्यक्ति भक्तिपूर्वक एकादशी को उपवास करता है, वह उस परम धाम को प्राप्त होता है जहाँ स्वयं भगवान जनार्दन (विष्णु) विराजमान हैं।
अपरा एकादशी व्रत FAQ
अपरा एकादशी क्या है?
यह ज्येष्ठ कृष्ण पक्ष की पावन एकादशी है, जिसे अचला एकादशी भी कहते हैं।
अपरा एकादशी 2026 में कब है?
यह 13 मई 2026, बुधवार को है।
अपरा एकादशी का पारण कब है?
पारण 14 मई 2026, सुबह 05:31 बजे से 08:14 बजे के बीच किया जाएगा।
क्या इस दिन चावल खा सकते हैं?
नहीं, एकादशी के दिन चावल वर्जित माना गया है।
इस व्रत का मुख्य लाभ क्या है?
पापों से मुक्ति, आत्मशुद्धि और भगवान विष्णु की कृपा प्राप्त होती है।
(डिस्क्लेमर: यह पाठ्य सामग्री आम धारणाओं और इंटरनेट पर मौजूद सामग्री के आधार पर लिखी गई है। Publicreact.in इसकी पुष्टि नहीं करता है।)
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