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Vat Savitri Vrat 2026 Date – वट सावित्री व्रत 2026 की सही तिथि, पूजा विधि, व्रत कथा, शुभ मुहूर्त और महत्व

पति की लंबी आयु, सुख-समृद्धि और अखंड सौभाग्य के लिए किए जाने वाले वट सावित्री व्रत 2026 की सही तिथि, पूजा विधि, शुभ मुहूर्त और महत्व संपूर्ण जानकारी।

भारतीय संस्कृति में व्रत और त्योहारों का विशेष स्थान है। ये पर्व न केवल धार्मिक आस्था के प्रतीक हैं, बल्कि परिवार, प्रेम और समर्पण की गहरी भावनाओं को भी व्यक्त करते हैं। ऐसा ही एक पावन पर्व है — वट सावित्री व्रत। यह व्रत विवाहित स्त्रियों द्वारा अपने पति की दीर्घायु, स्वास्थ्य और सुख-समृद्धि के लिए किया जाता है। इस दिन सुहागिन महिलाएँ वट वृक्ष (बरगद के पेड़) की पूजा करती हैं और सावित्री-सत्यवान की अमर प्रेम कथा का स्मरण करती हैं। यह व्रत भारतीय नारी की त्याग, निष्ठा और प्रेम की अद्भुत मिसाल है।

वट सावित्री व्रत का समय और तिथि

वट सावित्री व्रत ज्येष्ठ मास की अमावस्या को मनाया जाता है। कुछ प्रदेशों में यह ज्येष्ठ शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा को भी मनाया जाता है। उत्तर भारत में अमावस्या तिथि को इस व्रत का विशेष महत्त्व है, जबकि महाराष्ट्र, गुजरात और दक्षिण भारत के कुछ हिस्सों में पूर्णिमा को यह पर्व धूमधाम से मनाया जाता है। इस वर्ष यह व्रत मई-जून के महीने में आता है। ग्रीष्म ऋतु की तपती धूप में भी महिलाएँ इस व्रत को पूरी श्रद्धा और भक्ति के साथ करती हैं।

वट सावित्री शुभ पूजा मुहूर्त

पूजा के लिए सबसे प्रमुख शुभ समय अभिजीत मुहूर्त माना गया है, जो सुबह 11:50 बजे से दोपहर 12:44/12:45 बजे तक रहेगा. कुछ स्रोतों में प्रातःकाल पूजा मुहूर्त 7:12 से 8:24 बजे भी दिया गया है, इसलिए स्थानीय पंचांग के अनुसार समय मिलान करना अच्छा रहेगा.

तिथि का संक्षिप्त विवरण

  • व्रत तिथि: 16 मई 2026
  • अमावस्या प्रारंभ: 16 मई 2026, 5:11 AM
  • अमावस्या समाप्ति: 17 मई 2026, 1:30 AM
  • शुभ पूजा समय: 11:50 AM से 12:44/12:45 PM

वट वृक्ष का महत्त्व

इस व्रत में वट वृक्ष यानी बरगद के पेड़ की पूजा की जाती है। हिंदू धर्म में वट वृक्ष को अत्यंत पवित्र माना जाता है। इसे ब्रह्मा, विष्णु और महेश का प्रतीक कहा जाता है — जड़ों में ब्रह्मा, तने में विष्णु और शाखाओं में शिव का वास माना जाता है। वट वृक्ष की जड़ें गहरी, तना विशाल और छाया घनी होती है — ठीक उसी प्रकार जैसे एक पति का स्नेह और संरक्षण अपने परिवार पर होता है।

वट वृक्ष की एक और विशेषता यह है कि यह सैकड़ों वर्षों तक जीवित रहता है। इसीलिए विवाहित महिलाएँ इस दीर्घजीवी वृक्ष की पूजा करते हुए अपने पति की दीर्घायु की कामना करती हैं। वट वृक्ष की परिक्रमा करना और उसमें धागा लपेटना इस बात का प्रतीक है कि पत्नी अपने पति के जीवन से अटूट रूप से बंधी हुई है।

वट सावित्री व्रत की पूजा विधि

वट सावित्री व्रत की पूजा विधि अत्यंत सरल किंतु भावपूर्ण होती है:

  • प्रातःकाल स्नान — महिलाएँ सूर्योदय से पूर्व उठकर स्नान करती हैं और सोलह श्रृंगार करती हैं।
  • व्रत का संकल्प — पूजा से पूर्व पति की दीर्घायु और सुखी जीवन के लिए संकल्प लिया जाता है।
  • वट वृक्ष की पूजा — वट वृक्ष के नीचे सावित्री-सत्यवान और यमराज की मूर्ति या चित्र स्थापित किए जाते हैं। वृक्ष को जल, रोली, अक्षत, फूल, फल और मिठाई अर्पित की जाती है।
  • धागा लपेटना — महिलाएँ वट वृक्ष के तने के चारों ओर कच्चा सूत या लाल-पीला धागा लपेटते हुए परिक्रमा करती हैं। परिक्रमा की संख्या सात या तीन होती है।
  • कथा श्रवण — पूजा के दौरान सावित्री-सत्यवान की कथा सुनी और पढ़ी जाती है।
  • निर्जला व्रत — कई महिलाएँ इस दिन निर्जला व्रत रखती हैं, अर्थात् बिना जल के उपवास करती हैं।
  • व्रत का पारण — सायंकाल पूजा के बाद फल या सात्विक भोजन ग्रहण करके व्रत का पारण किया जाता है।

वट सावित्री व्रत कथा

भद्र देश के एक राजा थे, जिनका नाम अश्वपति था। भद्र देश के राजा अश्वपति के कोई संतान न थी। उन्होंने संतान की प्राप्ति के लिए मंत्रोच्चारण के साथ प्रतिदिन एक लाख आहुतियाँ दीं। अठारह वर्षों तक यह क्रम जारी रहा। इसके बाद सावित्रीदेवी ने प्रकट होकर वर दिया कि, “राजन! तुझे एक तेजस्वी कन्या पैदा होगी।” सावित्रीदेवी की कृपा से जन्म लेने के कारण उस कन्या का नाम सावित्री रखा गया।

कन्या बड़ी होकर अत्यंत रूपवान हुई। योग्य वर न मिलने की वजह से सावित्री के पिता दुःखी थे। उन्होंने कन्या को स्वयं वर तलाशने भेजा।

सावित्री तपोवन में भटकने लगी। वहाँ साल्व देश के राजा द्युमत्सेन रहते थे, क्योंकि उनका राज्य किसी ने छीन लिया था। उनके पुत्र सत्यवान को देखकर सावित्री ने पति के रूप में उनका वरण किया। ऋषिराज नारद को जब यह बात पता चली, तो वे राजा अश्वपति के पास पहुँचे और कहा, “हे राजन! आप यह क्या कर रहे हैं? सत्यवान गुणवान हैं, धर्मात्मा हैं और बलवान भी हैं, पर उनकी आयु बहुत छोटी है। वह अल्पायु हैं। एक वर्ष के बाद ही उनकी मृत्यु हो जाएगी।”

ऋषिराज नारद की बात सुनकर राजा अश्वपति घोर चिंता में डूब गए। सावित्री ने उनसे कारण पूछा, तो राजा ने कहा, “पुत्री, तुमने जिस राजकुमार को अपने वर के रूप में चुना है, वह अल्पायु हैं। तुम्हें किसी और को अपना जीवनसाथी बनाना चाहिए।” इस पर सावित्री ने कहा, “पिताजी, आर्य कन्याएं अपने पति का एक बार ही वरण करती हैं, राजा एक बार ही आज्ञा देता है, पंडित एक बार ही प्रतिज्ञा करते हैं, और कन्यादान भी एक ही बार किया जाता है।”

सावित्री हठ करने लगीं और बोलीं, “मैं सत्यवान से ही विवाह करूंगी।” राजा अश्वपति ने सावित्री का विवाह सत्यवान से कर दिया।

सावित्री अपने ससुराल पहुँचते ही सास-ससुर की सेवा करने लगी। समय बीतता चला गया। नारद मुनि ने सावित्री को पहले ही सत्यवान की मृत्यु के दिन के बारे में बता दिया था। वह दिन जैसे-जैसे करीब आने लगा, सावित्री अधीर होने लगीं। उन्होंने तीन दिन पहले से ही उपवास शुरू कर दिया। नारद मुनि द्वारा कथित निश्चित तिथि पर पितरों का पूजन किया।

वट सावित्री व्रत कथा

हर दिन की तरह सत्यवान उस दिन भी लकड़ी काटने जंगल चले गए, साथ में सावित्री भी गईं। जंगल में पहुँचकर सत्यवान लकड़ी काटने के लिए एक पेड़ पर चढ़ गए। तभी उनके सिर में तेज दर्द होने लगा। दर्द से व्याकुल सत्यवान पेड़ से नीचे उतर गए। सावित्री अपना भविष्य समझ गईं। सत्यवान के सिर को गोद में रखकर सावित्री उनका सिर सहलाने लगीं। तभी वहाँ यमराज आते दिखाई दिए। यमराज अपने साथ सत्यवान को ले जाने लगे। सावित्री भी उनके पीछे-पीछे चल पड़ीं।

यमराज ने सावित्री को समझाने की कोशिश की कि यही विधि का विधान है। लेकिन सावित्री नहीं मानी। सावित्री की निष्ठा और पतिपरायणता को देखकर यमराज ने सावित्री से कहा, “हे देवी, तुम धन्य हो। तुम मुझसे कोई भी वरदान मांगो।”

सावित्री ने कहा कि मेरे सास-ससुर वनवासी और अंधे हैं, उन्हें आप दिव्य ज्योति प्रदान करें। यमराज ने कहा, “ऐसा ही होगा। जाओ, अब लौट जाओ।”

लेकिन सावित्री अपने पति सत्यवान के पीछे-पीछे चलती रहीं। यमराज ने कहा, “देवी, तुम वापस जाओ।” सावित्री ने कहा, “भगवन! मुझे अपने पतिदेव के पीछे-पीछे चलने में कोई परेशानी नहीं है। पति के पीछे चलना मेरा कर्तव्य है।” यह सुनकर उन्होंने फिर से उसे एक और वर मांगने के लिए कहा।

सावित्री बोलीं, “हमारे ससुर का राज्य छिन गया है, उसे पुनः वापस दिला दें।”

यमराज ने सावित्री को यह वरदान भी दे दिया और कहा, “अब तुम लौट जाओ।” लेकिन सावित्री पीछे-पीछे चलती रहीं। यमराज ने सावित्री को तीसरा वरदान मांगने को कहा।

इस पर सावित्री ने 100 संतानों और सौभाग्य का वरदान मांगा। यमराज ने इसका वरदान भी सावित्री को दे दिया।

सावित्री ने यमराज से कहा, “प्रभु, मैं एक पतिव्रता पत्नी हूं और आपने मुझे पुत्रवती होने का आशीर्वाद दिया है।” यह सुनकर यमराज को सत्यवान के प्राण छोड़ने पड़े। यमराज अंतर्ध्यान हो गए और सावित्री उसी वट वृक्ष के पास आ गईं, जहाँ उनके पति का मृत शरीर पड़ा था। सत्यवान जीवित हो गए और दोनों खुशी-खुशी अपने राज्य की ओर चल पड़े। दोनों जब घर पहुँचे तो देखा कि माता-पिता को दिव्य ज्योति प्राप्त हो गई है। इस प्रकार सावित्री-सत्यवान चिरकाल तक राज्य-सुख भोगते रहे।

अतः पतिव्रता सावित्री के अनुरूप ही, प्रथम अपने सास-ससुर का उचित पूजन करने के साथ ही अन्य विधियों को प्रारंभ करें। वट सावित्री व्रत करने और इस कथा को सुनने से उपवासक के वैवाहिक जीवन या जीवनसाथी की आयु पर किसी प्रकार का कोई संकट आया भी हो, तो वह टल जाता है।

विभिन्न प्रदेशों में व्रत की परंपराएँ

  • भारत के विभिन्न राज्यों में यह व्रत अपनी-अपनी परंपराओं के साथ मनाया जाता है:
  • उत्तर प्रदेश, बिहार, राजस्थान — अमावस्या को बरगद की पूजा और कथा श्रवण का विशेष महत्त्व है।
  • महाराष्ट्र — पूर्णिमा को यह व्रत मनाया जाता है और महिलाएँ करंज के पत्तों से बनी माला अर्पित करती हैं।
  • गुजरात — इस दिन महिलाएँ मिलकर भजन-कीर्तन करती हैं और वट वृक्ष की विशेष सजावट की जाती है।
  • बंगाल — यहाँ इसे सावित्री व्रत के नाम से जाना जाता है और विशेष पूजा-पाठ होता है।

वट सावित्री व्रत भारतीय स्त्री की उस अटूट आस्था का प्रतीक है जो प्रेम को सर्वोच्च मानती है। यह व्रत हमें सिखाता है कि सच्चा प्रेम, अटूट विश्वास और दृढ़ संकल्प से कोई भी बाधा पार की जा सकती है। सावित्री ने अपने पति को यमराज से वापस लाकर यह सिद्ध कर दिया कि नारी की शक्ति असीमित है। इस व्रत को करने से केवल सांसारिक सुख ही नहीं, बल्कि आत्मिक शांति और जीवन में सकारात्मक ऊर्जा का भी संचार होता है।


आइए इस पावन पर्व पर हम सावित्री के आदर्शों को आत्मसात करें और अपने जीवन में प्रेम, निष्ठा और करुणा के मूल्यों को जीवंत रखें।

वट सावित्री व्रत FAQ

वट सावित्री व्रत कब है?

उत्तर भारत में वट सावित्री व्रत 16 मई 2026, शनिवार को रखा जाएगा। ज्येष्ठ अमावस्या तिथि 16 मई 2026 को सुबह 05:11 बजे शुरू होकर 17 मई 2026 को रात 01:30 बजे समाप्त होगी।

वट सावित्री व्रत किस लिए किया जाता है?

यह व्रत सुहागिन महिलाएं अपने पति की दीर्घायु, स्वास्थ्य, और सुखी दांपत्य जीवन के लिए करती हैं। यह सावित्री और सत्यवान की कथा पर आधारित है।

वट सावित्री पूजा में क्या किया जाता है?

इस दिन वट वृक्ष की पूजा की जाती है, जल चढ़ाया जाता है, मौली बांधी जाती है, परिक्रमा की जाती है, और सावित्री-सत्यवान की कथा सुनी जाती है।

वट सावित्री व्रत में क्या खाना चाहिए?

परंपरा के अनुसार कुछ महिलाएं निर्जला व्रत रखती हैं, जबकि कुछ फलाहार करती हैं। पूजा के बाद फल, चना, पूरी, पुआ, नारियल पानी और अन्य सात्विक प्रसाद लिया जा सकता है।

(डिस्क्लेमर: यह पाठ्य सामग्री आम धारणाओं और इंटरनेट पर मौजूद सामग्री के आधार पर लिखी गई है। Publicreact.in इसकी पुष्टि नहीं करता है।)

नोट: हमारे द्वारा उपरोक्त लेख में अगर आपको कोई त्रुटि दिखे या फिर लेख को बेहतर बनाने के आपके कुछ सुझाव है तो कृपया हमें कमेंट या फिर ईमेल के द्वारा बता सकते है हम आपके सुझावों को प्राथिमिकता के साथ उसे अपनाएंगे धन्यवाद !

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